‘संवैधानिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियां एवं दायित्व’ विषय पर वक्ताओं ने रखे अपने विचार

सीतापुर- निशान पब्लिकेशन द्वारा जारी विमर्श श्रंखला में हिंदी पत्रकारिता पर जारी विमर्श को आगे बढाते हुए ‘संवैधानिक मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में हिंदी पत्रकारिता की चुनौतियाँ एवं दायित्व’ विषय पर वक्ताओं ने अपने विचार रखे। वरिष्ठ पत्रकार हरिराम अरोड़ा ने कहा कि वर्तमान माहौल में सत्ता और मीडिया मालिकों का गठजोड़ सत्ता के अनुकूल माहौल बनाने में लगा हुआ है। ये स्वस्थ लोकतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए चिंता का विषय है। देश के अधिकांश मीडिया घरानों का मालिकाना हक एक ही बिजनेस घराने के पास है। उस घराने के मीडिया संस्थान के पत्रकार क्या स्वतन्त्रतापूर्वक काम कर सकते हैं? उन्हें सत्ता से नजदीकियां बनाने के लिए विवश किया जाता है। अगर वो ऐसा नहीं करते तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है। इन चुनौतियों से आज के पत्रकार का मुकाबला करना अत्यंत कठिन है। जो देश की ज्वलंत समस्याओं और मुद्दों पर पत्रकारिता करना चाहते हैं उन्हें नौकरी ही नहीं मिलती है। सोशल मीडिया पर जारी सरकार का विरोध भी धीरे धीरे सरकार को इस पर शिकंजा कसने के लिए उकसा रहा है।


वरिष्ठ पत्रकार, कवि एवं रंगकर्मी ज्ञान प्रकाश सिंह ‘प्रतीक’ ने अपनी बात रखते हुए कहा कि पत्रकारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग बेहद जिम्मेदारी से करना चाहिए। पत्रकारिता के क्षेत्र में आ रहे अवांछित लोगों की समस्या पर बोलते हुए अपने कहा कि आज ऐसे ऐसे लोग पत्रकारिता में आ रहे हैं जो न तो पत्रकारिता के बारे में जानते हैं और न ही उनका इस सम्बन्ध में कोई अध्ययन है। ऐसे लोग पत्रकारिता की गरिमा को क्षति पहुंचा रहे हैं। सत्य का साथ देना हमेशा ही कठिन होता है। सत्य का साथ देने से ही ईसा मसीह को सूली पर लटकना पडा था और आज के पत्रकारों को सच बोलने और लिखने के लिए वैसी ही कुर्बानी देनी होगी तभी समाज और देश का हित सम्भव है। भारत देश विविधताओं से भरा देश रहा है और मीडिया इस देश की विविधताओं को सकारात्मक ढंग से पेश कर देश को एकजुट और समृद्ध करने का काम करता रहा है लेकिन आज के समय में ठीक इसका उल्टा हो रहा है। ये स्थिति बेहद चिंताजनक है। पत्रकारों को सत्ता की चरण वन्दना करने के बजाये आम जनता के प्रतिनिधि के रूप में सत्ता से परस्पर प्रश्न करते रहना चाहिए जिससे सत्ता निरंकुश न होने पाए। जो लोग नीर-क्षीर विवेक के आधार पर पत्रकारिता कर रहे थे आज उन्हें ढूंढना मुश्किल है। इस समय पत्रकारों का ये परम कर्तव्य बनता है कि अपनी महत्ता को समझते हुए उसे आम जनमानस के हित में प्रयोग करें और देश में फैल रही नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदलने के लिए प्रयत्नशील रहें।

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