आज अजीब वक्त है लोग पहचान के चक्कर में अपने को ही गुम किये है। कहीं न कहीं व्यक्तित्व की कमी, हमारा खाली पन शोभित चिंन्तन की कमी से हम दर बदर भटकते रहते है।
आज वक्त है प्रदेश से ऊपर उठकर राष्ट्रीय स्तर की नेता गिरी का वो भी जब हम उस लायक नही। मजा तब आता है जब हिन्दू किसी संघटन से जुड़ते हैं। तो यह भाव नही रखते। खास तौर से वह जो नारंगी वस्त्र पहन कर बाबा दिखाते हैं। संपत्ति सब रघुपति कै आही का भूले रहते है।
जब तक ऊपर से टिकट न कट जाए पद पर गिरिगिट की तरह आंख लगाए रहते है। दो चार लोग भटके या गुमराह या अन्ह से ग्रसित उनका पानी भरते है। कैसे समाज मे बदलाव आए।
जेब मे संघटन के लिए एक फूटी कौड़ी नही।
पद का लोभ।
अंधेरी नगरी चौपट राजा।
हम सही जगह रहे, सही सोच सके यह विवेक भी ईश्वर ही देता है। कपड़े रंगने से हम आद्यात्मिक नही होते।
सूट टाई में भी हम जीवन को निर्लिप्त भाव से जी सकते है।
शोभित पोस्ट एक शेर से बिराम।
जिनके पास अपने है वह अपनो से झगड़ते है,
जिनका कोई नही वह अपनो को तरसते है।।
शोभित टंडन, सीतापुर
