जीवन जिस संसार मे चल रहा है.. वह रोडवेज बस की तरह है : शोभित

जीवन जिस संसार मे चल रहा है। शोभित चिंन्तन से देखे वह रोडवेज की बस की तरह है। टिकट सब लिए होते है, लेकिन जो सीट पा जाता है वह गंतव्य तक के लिए उस सीट का मालिक समझने लगता है।

यही संसार मे होता है। हम अपनी छोटी सोच के माया जाल में फंसे फंसे अंत कर लेते है। उस खुदा या परमात्मा को समझने की जहमत नही उठाते। मंजिल आते ही हम सीट छोड़ देते है। लेकिन संसार मे रहते हुए सीट छोड़ने की तैयारी नही रखते।

बस यही गुनाह हर बार करता है इंसान हम आस पास के जरूरतमंद लोगों को सीट पर गुंजाइश की नही सोचते यही हमे हमारी पर्सनलिटी की कमजोरी कहे या शून्यता को दर्शा देता है। संसार की भी हमारी दशा यही सोच रेखांकित कर देती है।

3 सितम्बर अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के व्यापारी दिवस पर अपने उद्बोधन में भी अपर पुलिस अधीक्षक डाक्टर राजीव दीक्षित जी ने सुविचार रखा। हम इस पृथ्वी और प्रकृति का प्रयोग के बिना जीवन नही जी सकते। लेकिन हमें इसे विनम्रता पूर्वक भोग करते हुए विनम्रता पूर्वक छोड़ने की आदत कहे या स्वभाव ही हमारी अनिवार्यता सिद्ध कर सकता है।

एक शेर से शोभित पोस्ट बिराम।

नजर बचा के गुजर जाते हो तो गुजर जाओ,
मैं आईना हूँ मेरी अपनी जिम्मेदारी है।

शोभित टण्डन, सीतापुर

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