खुदा भी असीम ताकत रखता है, शरीर मे अनेकों मशीनें फिट कर दी है, सब एक दूसरे से इन्टरकनेटटेड है।
ऐसे ही शरीर मे आंखों में छुपे आंसू होते है। शोभित चिंन्तन से देखे न जाने कहाँ छिपे रहते है। कब बहने लग जाए।
कभी खुशी में, कभी दुख में, कभी क्षोभ में, कभी एहसास से, कभी दूरी से, कभी ठगे जाने से, कभी सब कुछ होते हुए भी कुछ न होने के एहसास से, किसी की नफरत से, किसी की मोहब्बत से बह ही जाते है।
मजा इस बात का होता है।
आंसुओ की अलग अलग तासीर का पता मौके से बहने के ढंग से लग जाता है। वक्त कभी ऐसा भी आता है कि इंसान दिखने वाली भीड़ में भी अपने को अकेला पाता है, तन्हा पाता है, खाना बदोशी का एहसास सिर चढ़ कर बोलने लगता है।
लेकिन अंधेरों में, तन्हाई में आंसू देखे भी कौन और देखे भी क्यों।
पत्थर तो कहने के लिए ही पत्थर होते है,इंसान भी पत्थर से भी कठोर होते है।
पत्थर वही जिसमे जज्बात न हो, एहसास न हो।
चार लाइनों से धमकती जनमाष्टमी की शुभकामनाओं सहित शोभित पोस्ट बिराम।
कैसे यकीन कर लूं कि फिर आइयेंगा आप, आ भी गए तो मुझको कहाँ पाइयेगा आप, ये दिल है इसको तोड़ के पछताइयेगा आप, आइना देखने को तरस जाइयेगा आप l
शोभित टण्डन, सीतापुर
