राज खन्ना, सुलतानपुर
अनिता निषाद सातवें में पढ़ती है। आत्मविश्वास से लबरेज़। माइक संभाला । कहा जो आज नही आये उन्हें जरुर आना चाहिए था। आज 15 अगस्त है। आज ही देश आजाद हुआ। आज राखी भी है। पर देश आजाद न होता तो हम कौन सा त्योहार मना पाते ? इसलिए आजादी का पर्व सबसे पहले। कोई त्योहार उसके बाद।
बाजू में बहती गोमती का पाट इन दिनों ज्यादा पसरा है। जलधारा कुछ ज्यादा हलचल लिए। घने पेड़ों और सरपत के झुरमुटों से घिरा टीला। सिर पर खुला आसमान। बादलों की लुकाछिपी। कच्ची जमीन में बच्चे घर से लायी बोरिया पर बैठे हैं। बहुत से मिट्टी पर ही बेफिक्र हैं। ये उनका गुरुकुल है। रोज़ शाम को वहां जुटते हैं। पास पड़ोस के गांवों से आते हैं। नाव से गोमती पार कर भी पहुंचते हैं। 2011 से वहां ” कोशिश ” की कक्षाएं चल रही हैं। कमला नेहरु प्रोद्योगिकी संस्थान सुल्तानपुर के उस दौर के छात्र चेतन गिरी ने कुछ दोस्तों साथ शुरुआत की थीं। सफ़र जारी है। पतवार थामने वाले हाथ बदलते रहते हैं। चेतन अब मुम्बई में एक राष्ट्रीयकृत बैंक में अधिकारी है। जीवनसंगिनी मान्या एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर। जज़्बा कायम है। फिक्र मुम्बई में रहते हुए भी करते हैं। 15 अगस्त और 26 जनवरी को तो इन्ही बच्चों के बीच जरुर रहते हैं। अब मान्या भी साथ होती हैं। बच्चों को उनका इंतजार रहता है। कोशिश से जुड़े पुराने साथी जो कहीं दूसरे स्थानों पर हैं, वे सब भी उसकी कक्षाओं को जारी रखने के लिए योगदान करते रहते हैं ।
कोशिश की कक्षाओं में इन दिनों दो-सवा दो सौ बच्चे पहुंच रहे हैं। एक से बारह तक के। उन्हें पढ़ाने वाले खुद कमला नेहरु प्रौद्योगिकी संस्थान के बीटेक के विद्यार्थी रहते हैं। पास-पड़ोस के गांवों-कस्बे के ये बच्चे कमजोर वर्ग के हैं। कोचिंग और प्राइवेट ट्यूशन का बोझ उनके अभिभावक नही उठा सकते । उनका भविष्य संवारने के इस अभियान का एक दूसरा सुखद पहलू भी है। इन कक्षाओं ने बहुत से बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रेरित कर दिया । बीच में पढ़ाई छोड़ देने वाले अनेक बच्चों को ऐसा करने से रोक दिया। पढ़ाई छोड़ मछली मारने, बान बुनने , बीड़ी बनाने जैसे पैतृक रोजगारों में समय से पहले खट जाने या फिर गलत रास्ते पर भटक जाने से भी सचेत किया।
ये बच्चे साधनों से भले कमजोर हों लेकिन उनके इरादे मजबूत हैं। उनकी आंखों में सपने हैं और उन्हें सच करने का हौसला भी। 15 अगस्त के उनके सांस्कृतिक कार्यक्रम में इसकी बानगी भी दिखी। तिरंगे के नीचे एक से दूसरे किनारे तक उनकी कृतियाँ सजी थीं। तिरंगी डोरी के एक ओर बच्चे और दूसरे को मंच मान लीजिए। वहां कोई पर्दा गिरता-उठता नही। वे प्रस्तुति देते हैं और उनके शिक्षक-निदेशक सामने से ही संकेतों में उनकी सहायता देते हैं। वे एकांकी और अन्य कार्यक्रमों के दृश्यों की जरूरतों के मुताबिक परिधान नही जुटा सकते लेकिन अलग-अलग रंगों की अपनी पोशाकों में भी मस्ती साथ एकजुट हैं। उनके आत्मविश्वास का क्या कहना ! तय कार्यक्रमों के अलावा भी बच्चों को अवसर दिया गया। फौरन ही कुछ न कुछ प्रस्तुत करने के लिए बच्चे आगे आ गए। ये बच्चे शर्माते-खिसियाते नही। कहीं लुकने-छिपने का जतन नही करते। कोशिश ने उन्हें हौसलों का आसमान दिखाया है और जमीन पर टिके रहने का सलीका भी सिखाया है। वे आगे बढ़ना चाहते हैं। उन्हें पता है कि उसके लिए पढ़ना जरूरी है। क्या पढ़ना जरूरी है ? मुम्बई से आयी मान्या ने उनसे सवाल किया। हर बच्चे का अंग्रेजी पढ़ने-सीखने-बोलने की चाहत में हाथ उठा। बाद में मान्या ने उन्हें समझाया कि अंग्रेजी जरूर पढो लेकिन एक भाषा के नाते। हिंदी मातृभाषा है। उसे जियो। प्रतीकों के जरिये प्रोफेसर एच डी राम भी इन बच्चों को मातृभाषा का महत्व समझाते रहे। पर बच्चों को जो जरूरत समझ आयी , वे उसे कह चुके थे। कोशिश से जुड़े डॉक्टर के एन शुक्ल लखनऊ से आये। बच्चों के पुराने शिक्षक इंजीनियर आशीष सिंह अपनी शिक्षिका पत्नी स्तुति साथ वाराणसी से। डॉक्टर रंजना सिंह, समाजसेवी करतार केशव यादव , पत्रकार दर्शन साहू और संतोष यादव। सब इन बच्चों की क्षमता को सराहते और संभावनाओं के प्रति आश्वस्त।
बच्चे थमने को तैयार नही। पर सूरज अस्त होने को। फिर घनेरे बादलों का डेरा। कुछ बूंदें गिरीं। और इन बच्चों की प्रस्तुतियों में सहायक उनके शिक्षक दूसरी भूमिका में। उन्होंने तिरपाल संभालना शुरू कर दिया। बरसात होती है तो पढ़ाना छोड़ ये शिक्षक बच्चों को तिरपाल की ओट देते हैं। खुद भीगते हैं। बच्चों को नही भीगने देते। सच !
