मेरी वृन्दावन है ससुराल
सम्हाल राणा अपनी नगरी
पिसावां (सीतापुर) इलाके के हसनापुर गावँ के समीप ब्रम्हदेव स्थान पर चल रहे पंचम श्री रुद्रमहायज्ञ के दौरान मथुरा वृन्दावन से आये लड्डू गोपाल लीला दर्शन मंडल के कलाकारों द्वारा कृष्ण भक्त मीरा का मंचन किया गया।
मीराबाई का विवाह महाराणा सांगा के पुत्र भोजराज से कर दिया गया। इस शादी के लिए पहले तो मीरा बाई ने मना कर दिया। पर जोर देने पर वह फूट फूटकर रोने लगी और विदाई के समय कृष्ण की वहीं मूर्ति अपने साथ ले गई, जिसे उसकी माता ने उनका दूल्हा बताया था। मीराबाई ने लज्ज़ा और परंपरा को त्याग कर अनूठा प्रेम और भक्ति का परिचय दिया। विवाह के दस बरस बाद उनके पति का देहांत हो गया।

मीरा बाई के कृष्ण प्रेम को देखते हुए लोक लाज की वजह से मीराबाई के ससुराल वालों ने उन्हें मारने के लिए कई चालें चाली पर सब विफल रही। मीरा बाई ने भक्ति को एक नया आयाम दिया है, एक ऐसा स्थान जहां भगवान ही इंसान का सब कुछ होता है। दुनिया के सभी लोभ उसे मोह से विचलित नहीं कर सकते। एक अ’छा खासा राजपाट होने के बाद भी मीरा बाई वैरागी बनी रहीं।इस दौरान मुन्नासिंह, मोतीलाल, फुनई,धर्मेंद्रसिंह सहित दूरदराज से आये काफी संख्या में दर्शक मौजूद रहे।
रिपोर्ट- अरुण शर्मा
