रियासत अली सिद्दीकी
रामकोट/सीतापुर। रमजान-उल-मुबारक के आखरी जुमे को रामकोट कस्बे की जामा मस्जिद में मुफ्ती उमैर ने अलविदा की नमाज अदा कराई। मुफ्ती उमैर ने रामकोट में अलविदा की नमाज से पहले बताया कि
अलविदा का मतलब है किसी चीज का रुखसत होना। यानी रमजान हमसे रुखसत हो रहा है। इस दौरान जुमे में अल्लाह से खास दुआ की जाती है कि आने वाला रमजान हम सब को नसीब में हो और पूरे साल हम हर मुसीबत से महफूज रहें।
यहां अलविदा का अर्थ रमजान का रुखसत होना है। रमजान के आखिरी जुमे को अलविदा के नाम से पुकारा जाता है। इसके बाद कोई जुमा नहीं आता। इसलिए आखिरी जुमे को पढ़ी जानेवाली नमाज अलविदा की नमाज कहलाती है। वैसे तो इसलाम में हर जुमे की अहमियत है, लेकिन रमजान का आखिरी जुमा होने के चलते यह खास हो जाता है। एक तरह से यह इस बात का संकेत भी होता है कि रमजान का जो एक महीना इबादत के लिए मिला था, उसके खत्म होने में चंद दिन ही शेष है।
उधर नमाज के बाद विभिन्न मस्जिदों में मौलानाओं ने तकरीर कर फितरे, जकात व शबे कद्र के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि फितरे की रकम हर हाल में ईद की नमाज से पहले अदा कर देना चाहिए। जकात के लिए इसकी कोई बंदिश नहीं है। लेकिन यह जरूरी है कि जो लोग हैसियत वाले हैं,वे अपनी रकम का ढाई फीसदी जकात निकालेंगे। उन्होंने कहा कि पूरे रमजान में इबादतों का दौर रहता है, लेकिन रमजान के आखिरी अशरे में 21वीं, 25वी, 27वीं व 29वीं रात को जागकर इबादत करना चाहिए।
