कुर्बानी के दिनों में कुर्बानी से अफजल अमल कोई नहीं
रियासत अली सिद्दीकी
ईद-उल-अजहा हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम और उनके बेटे हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम की यादगार है। ज़कात और फित्रा की तरह क़ुर्बानी भी एक माली इबादत है। (जो मालदारों पर वाजिब है) और हज़रत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की सुन्नत भी है। जो इस उम्मत के लिए (हमेशा) बाकी रखी गई है। खास जानवर को मख़सूस दिनो और वक़्तों में अल्लाह तआला की रजा के लिए सवाब की नियत से ज़ब्ह करने को कुर्बानी कहते है। अल्लाह तआला को उऩ कुर्बानियों का गाेश्त और खून नही पहुँचता। उसके यहां तो तुम्हारे दिल का तक़वा और अदब पहूंचता है। कि केसी खुश दिली और जोशे मुहब्बत के साथ एक कीमती और नफीस चीज़ उसकी इजाज़त से उसके नाम पर कुरबान कर दी। गोया इस कुरबानी से जाहिर कर दिया कि हम खुद भी तेरी राह मे इसी तरह कुरबान होने के लिए तैयार है। माली इबादात में कुर्बानी का एक खास मकाम है। क्योंकि अस्ल तो यह था कि अपने जान और माल की कुर्बानी दी जाती और बवक़्ते जरुरत हर मुसलमान दीने इस्लाम के लिए यह सब कूछ कुर्बान कर देता। घर में कुर्बानी उस शख्स पर वाजिब है जो माले निसाब का मालिक हो। अगर किसी ने अपने नाम से कुर्बानी करने के बजाए घर के उन लोगों के नाम से क़ुरबानी की जो माले निसाब के मालिक नहीं है। जैसे बच्चे, या फौत शुदा लोग तो उनकी तरफ से कुर्बानी नफ़्ल अदा होगी। और अपने नाम से नही की तो गुनाहगार होगा। हां अपने नाम से क़ुर्बानी करने के साथ बाद या पहले घर के दूसरे लोगों के नाम से भी दूसरी अलग कुर्बानी का इंतेजाम करना बहुत ही उम्दा और अच्छा काम है।
याद रहे कि साहिबे निसाब पर हर साल कुर्बानी वाजिब है। कुछ लोगों का यह खयाल है। कि अपनी तरफ से जिन्दगी में सिर्फ एक बार कुर्बानी वाजिब है। शरअन गलत और बे बुनियाद है।
हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म पर अपने बेटे को एक बयाबान इलाके में छोड़ आए। माँ हाजिरा ने इनके बचपन का पूरा किस्सा इनके वालिद को सुनाया की जब पानी और खुजूर सब कुछ खत्म हो गया तब हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने अपनी ऐड़ियों को रगड़ना शुरु किया। भूख और प्यास की सिद्दत को देख कर माँ हाजिरा ने शफा और मरवा की पहाड़ियों पर पानी की तलाश में दौड़ती रही। हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम की ऐड़ियों की रगड़ने की वजह से अल्लाह ने एक चश्मा जारी किया जिसको आबे जम-जम कहा जाता है। हजारो साल पहले इसी जमी पर यह वाकिया पेश आया कि एक मरतबा हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने ख्वाब में देखा कि अपने प्यारे बेटे हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम की कुर्बानी दे रहा हूं। नबियों का ख्वाब हमेशा सच होता था। इसीलिए हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अपने बेटे हजरत इस्माईल अलैहिस्सलाम से अपने ख्वाब को बयान फरमाया। कि ऐ बेटे मैंने ख्वाब में देखा है कि मैं तुझे अल्लाह की राह में कुर्बान कर रहा हूं। हजरत इस्माइल अलैहिस्सलाम ने फरमाया ऐ अब्बा अल्लाह ने जो आपको हुक्म दिया है उसे कर गुजरिये मुझे आप सब्र करने वालों में पाएंगे। आसमान से अल्लाह की आवाज आयी की ऐ इब्राहिम तुमने अपना ख्वाब सच कर दिखाया। तभी से यह तरीका मुस्लमान अपनाते आ रहे है। सहाबा ने अल्लाह के नबी से पूछा ऐ नबी कुर्बानी क्या है। अल्लाह के नबी ने फरमाया तुम्हारे बाप हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की सुन्नत है, सहाबा ने फिर पूछा इसमें हमारे लिए क्या है नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया हर बाल के बदले एक नेकी। नबी हुजूर पाक सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया कुर्बानी के दिनों में क़ुरबानी से ज्यादा महबूब अमल कोई नहीं। हर मुस्लमान पर कुर्बानी लाजिम है। जिसके पास साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना या इनको खरीदने की रकम या तिजारत का माल हो। उन पर कुर्बानी लाजिम (फर्ज) हो जाती है। वो औरते जो अपने जेवर की मालिक है उन पर भी क़ुरबानी वाजिब है। कुर्बानी अफजल है कि 10 जिलहिज्जा को करे या ग्याराह और बारह को भी कर सकते है। कुर्बानी के गोस्त को तीन भाग में बाटा जाता है एक हिस्सा गरीबो के लिए दूसरा हिस्सा रिस्तेदारो के लिए और तीसरा हिस्सा अपने लिए रखा जाता है। कुर्बानी करने वाला गोस्त की नियत ना रखे।
