शिष्य बनकर हम कुछ सीखने सुधरने जाते है या इच्छाओं की अनवरत पूर्ति के लिए : शोभित

आज कल एक बड़े पीठाधीश्वर की आक्समयिक मौत से लोग हतप्रभ है, होना भी चाहिए सनातनी परम्परा के जो लोग अपने जीवन को ईश्वरीय व्यव्यस्था से जोड़े है उनके आक्समयिक देहावसान पर दुख भी होता है। क्षोभ भी।

कि क्या शिष्य बनकर हम कुछ सीखने सुधरने जाते है या इच्छाओं की अनवरत पूर्ति के लिए।

शास्त्र भी कहते है। शत्रु से कड़ी शर्तो पर भी संधी नही करना चाहिए तपा हुआ पानी अग्नि को बुझा ही देता है। यहीं चूक इस विषय मे होगी जो दुश्मन प्रव्वत्ति के थे उनको माफ करना।

शोभित चिंन्तन अगनित विचारो को रोज प्रस्फुटित कर देता है। वजह शास्त्र को याद कर हम शायद समझने या उसे ह्रदयंगम करने में विफल हो जाते है। ईश्वर भी उन्ही की रक्षा माता पिता की तरह करता है,जो बच्चे की तरह रक्षा करते है। वजह हम शायद मान की चकाचौंध में खुद को गुम करते है। और आसिमिक मौत से ईश्वर हमे नही बचाता।

शायद हम उससे शरणागति भाव से दूर रहते है। आश्रम शब्द अब एक निशाने पर आ चुका है। जिसमे गिद्ध प्रवत्ति के लोग इसके ऊपर आंख गड़ाए रहते है। खैर ईश्वर कृपा करें। राम नाम की शरणागति ही हमे बचा सकती है। श्री राम।

शोभित टण्डन , सीतापुर

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