हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी, फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी: शोभित

नकारात्मक, सकारात्मक हम किताबो में पढ़ते हैं,भाषणों में सुनते हैं। लेकिन शोभित चिंन्तन जाग्रत नही कर पाते।

वजह दिल मे बैठा पाना और बोलना दो अलग अलग तरीके है जिंदगी को समझने के। अक्सर हम जिंदगी के मूल स्वरूप से बिल्कुल जुदा हो जाते है। मान, ज्ञान और धन के पीछे सोच केंद्रित होकर ठहर जाती है।
पीछे एक घुप्प अंधेरा दृष्टिगोचर होता है। लेकिन अरे भी हम कह नही पाते।
वजह वक्त साथ नही देता।
शोभित चिंन्तन के आधार यहीं समझ आया।

कुछ कहा क्या जाय, क्या समझा जाये। जब उस परिधि में ही नहि आते या परिधि है क्या समझ नही पाते। शायद उत्तरकाण्ड में कही राम के द्वारा कहीं भक्ति का सार हम सरल हो कुटिल न हो और संतोष रखे। इसी से चूक हमारी गिल्ली उड़ा देती है, हम समझ नही पाते।

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी,

फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी।

शोभित टण्डन, सीतापुर

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