संसार मे विभिन्न विचारो के लोग विद्यमान है- शोभित

जीवन मे, संसार मे, भाव मे, भाव विहीन में, समय से, समय से बाहर, मतलब से, बिना मतलव के, अपने से, या गैरो से, बात और भाव विभिन्न विचारो के प्रस्फुटन का कारण और फिर शोभित चिंन्तन उसका निवारण होता है।

निवारण भी है क्या। निवारण मात्र यह कि हम अपने को देख पाए, समझ पाए, जीवन के व्यतीत पलों से कुछ समझ पाए। संसार मे विभिन्न विचारो के लोग विद्यमान है।

वजह श्रष्टि अनन्त जो है।
लेकिन यह भी सच है, कि निर्गुण रूप में ईश्वर हर जगह विधमान है, सगुण रूप वैसा ही जैसा हम जीवन मे अपने लोगो को याद करते है, देखते है, उनसे स्नेह करते है। वजह निर्गुण से डरा जा सकता है, लेकिन स्नेह नही किया जा सकता।

सगुण से हम दुलार भी कर सकते है। उसका आदर भी कर सकते है, बात भी कर सकते है, स्नेह और शोभित चिंन्तन से उसे समझने का प्रयास भी कर सकते है।
अपने जीवन के घटित घटनकर्मो और उसके निजाम को समझने का तारतम्य भी बैठाल सकते है। सबसे बेहतर है सोते जगते उस अनन्त खुदा के आश्रित हो जाना। आश्रय संतोष भी देता है, क्षोभ खत्म करता है, निर्भयता देता है।

गीता के अठहरवे अध्याय में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है.. मन, वाणी और शरीर द्वारा सर्वस्व अर्पण करके अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेम से विहलतापूर्वक पूजन करने वाला हो और मुझ सर्वशक्तिमान, बिभूति, बल, ऐश्वर्य, माधुर्य, गंभीरता, उदारता, वात्सल्य और सह्रदयता आदि गुणों से सम्पन्न सबके आश्रयरूप वासुदेव को विनयपूर्वक भक्ति सहित साष्टांग दंडवत प्रणाम कर।

दण्डवत यानी पूरी तरह उस ब्रह्म के आश्रित हो जाना, कलियुग केवल नाम अधारा, नाम ही काफी है। सोते समय जगते हुए कार्यो को करते हुए, ओर यह अभ्यास बन जाये आंख खुले और प्रभु का स्मरण हो जाये। यही एक मात्र आश्रय है। और कभी शोभित के ब्रेन हेमरेज के समय भी यही आश्रय भजन से जोड़े रखेगा। निजात दिलाएगा इस संसार से।

शोभित पोस्ट एक शेर से बिराम।

किसी से इश्क करते हो फिर खामोश ही रहिएगा,
जरा सी ठेस से यह शीशा टूट जाता है।

शोभित टण्डन
शोभित टण्डन आश्रम, सीतापुर

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