आनन्द कुमार मेहरोत्रा
कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाले उन्नाव रेप केस में आखिरकार न्याय की बुझती लौ एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने रोशन कर दी। इस केस से न सिर्फ उत्तर प्रदेश पुलिस का दागदार चरित्र ही उजागर हुआ बल्कि योगी सरकार की भी जमकर किरकिरी हुई। पूरी थुक्का फजीहत कराने के बाद भले ही भाजपा ने अपने इस कुख्यात विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को बाहर का रास्ता दिखा दिया हो लेकिन इस पूरे मामले में योगी सरकार की जो बदनामी हो रही है उसकी भरपाई करना भाजपा के लिए आसान नहीं है।
इस मामले की शुरुआत 4 जून 17 को उस समय हुई थी जब उन्नाव के माखी गांव की पीड़िता ने विधायक कुलदीप सिंह सेंगर पर रेप का आरोप लगाया था। विधायक पर आरोप लगाने के 2 साल के भीतर हर वो शख्स तबाह हो गया या मर गया या जेल चला गया या घायल हो गया जो पीड़िता का तरफदार था। सबसे पहले पीड़िता के पिता की पुलिस हिरासत में मौत हुई फिर पीड़िता के चाचा को सजा हुई उसके बाद पीड़िता की कार का एक्सीडेंट हुआ जिसमें पीड़िता और उसके वकील जिंदगी मौत से जूझ रहे हैं जबकि पीड़िता की चाची और मौसी की मौत हो चुकी है।
गौर करने वाली बात है कि इस पूरे मामले में सरकार और पुलिस ने विधायक के खिलाफ तभी कोई कार्यवाही की जब कोर्ट ने हस्तक्षेप किया। विधायक के खिलाफ रेप की एफ आई आर भी कोर्ट के आदेश पर हुई। विधायक की गिरफ्तारी भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के स्वत संज्ञान लेने के बाद हुई। अब इस मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने संज्ञान लिया है और कई सख्त आदेश पारित किए हैं जिससे पीड़िता को न्याय मिल सके और दूध का दूध और पानी का पानी अलग हो सके।
सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान लेने से एक उम्मीद यह जरूर जगी कि अगर सरकारें पक्षपाती हो, पुलिस नकारा हो और समाज आंखें बंद कर ले तब भी न्याय की एक किरण भारत की न्यायपालिका मौजूद है जो सिर्फ न्याय देने वाला एक विभाग ही नहीं कमजोरोंं, बेसहारों और पीड़िताओं का संरक्षक भी है।
