रमजान गुनाहों को जला देता है और रमजान की चांद रात (लैलतुल क़द्र ) होती है : मौलाना आसिम इकबाल नदवी

बिसवां(सीतापुर): रमजान में रिया नहीं होती बाकी सभी इबादतों में रिया मुमकिन है इस तरह रोजा सबसे अलग तरह की इबादत है रमजान का महीना आने से पहले इसकी पूरी तैयारी कर ली जाए और इरादा करें कि गुजिस्ता रमजान से ज्यादा इस रमजान में हम बढ़-चढ़कर इबादत करेंगे । रोजे़ का अज्र अल्लाह

तआला अपने आप से देगा जिसकी कोई तादाद नहीं। बल्कि इसका सवाब असीमित है ।
जकात रमजान में ही देने की चलन गलत पड़ गई है जकात साल पूरा होने वाले माल पर दी जाती है। जकात सिर्फ उन लोगों को नहीं दे सकते जिनसे आप पैदा है या फिर जिनको आप ने पैदा किया है।
इसके सिवाय सबको जकात दी जा सकती है। ₹26000 या मिल्कियत पर जकात वाजिब है । सदक-ए-फित्र हैसियत के अनुसार देना चाहिए यह खजूर , किशमिश, जौ, गेहूं से अदा करनी चाहिए। फितरा अमीर गरीब सभी को देना चाहिए क्योंकि इससे रमज़ान मे रोज़ों की कमियां/ छोटे-मोटे गुनाह माफ हो जाते हैं ।
रमजान में बड़ा तोहफा शबे कद्र है जिसमें एक रात की इबादत हजारों रातों से बेहतर है इस रात को जरूर तलाश करके इबादत करनी चाहिए, इस बात का ध्यान रहे की इबादत सिर्फ अल्लाह के लिए जाए जिसमें अल्लाह से मोहब्बत – इश्क दीवानगी का एहसास हो ।
रमजान गुनाहों को जला देता है और रमजान की चांद रात (लैलतुल अज्र लैलतुल क़द्र) होती है ।
इसलिए इस रात में भी खूब इबादत करने के बाद ईदगाह में इनाम हासिल किया जाए । उक्त बातें मौलाना आसिम इकबाल नदवी ने मस्जिदे हमजा(तोप खाना) मिरदही टोला में जुमा (अलविदा) के दिन नमाज़ियों को खिताब करते हुए कही ।
पूरे शहर की तमाम मस्जिदों में अलविदा की नमाज पहले से तय समय पर पढ़ी गई जिनमें मुख्य रूप से जमा मस्जिद ,डिप्टी साहब मस्जिद, शाही कंकड़ वाली जा़मा मस्जिद, नूरी मस्जिद, चारमीनारी मस्जिद , गौढ़ी मस्जिद , हज़रत चौपान शहीद आदि मस्जिदों के नाम शामिल हैं ।
इन तमाम मस्जिदों में इमामों ने तकरीर करते हुए मुसलमानों को पूरा साल नमाज पढ़ने की नसीहत दी।
ईदगाह में ईद उल फित्र की नमाज सुबह 10:00 बजे अदा की जाएगी जिसकी इमामत मौलाना जावेद इकबाल नदवी ,शहर काजी करेंगे। वहीं दूसरी तरफ जिगर वेलफेयर एंड डेवलपमेंट सोसाइटी के सचिव सिराज अहमद व युवा समाजसेवी वहाजुद्दीन ग़ौरी ने शांतिपूर्वक त्यौहार मनाए जाने की अपील की है ।

रिपोर्ट- वहाजुद्दीन ग़ौरी

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